
तेज इंडिया TV News 24 | न्यूज़ डेस्क
रिपोर्ट: कृष्णा प्रताप त्रिपाठी

गाली-गलौज वाली भाषा SC/ST कानून के तहत स्वतः अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि सिर्फ गाली-गलौज या अपमानजनक भाषा का प्रयोग अपने आप में SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक यह स्पष्ट रूप से किसी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने के उद्देश्य से न किया गया हो।

शीर्ष अदालत ने कहा कि धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए यह साबित करना अनिवार्य है कि आरोपी ने जानबूझकर, सार्वजनिक स्थान पर, पीड़ित को उसकी जाति का उल्लेख करते हुए अपमानित किया हो। केवल सामान्य या अस्पष्ट आरोप इस कानून के तहत दंड के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
आरोप स्पष्ट और ठोस होने चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि एफआईआर या शिकायत में आरोप स्पष्ट, विशिष्ट और तथ्यों पर आधारित होने चाहिए। यदि शिकायत में यह स्पष्ट नहीं है कि अपमान जाति के नाम से और उसी आधार पर किया गया, तो ऐसे मामलों में कठोर धाराएं लागू नहीं की जा सकतीं।
न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर चिंता
अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य वास्तविक पीड़ितों को न्याय दिलाना है, न कि इसे व्यक्तिगत रंजिश या दबाव बनाने का हथियार बनने दिया जाए। बिना ठोस आधार के दर्ज मामलों से न्यायिक प्रक्रिया पर अनावश्यक बोझ पड़ता है।
निचली अदालतों को निर्देश

शीर्ष अदालत ने निचली अदालतों और जांच एजेंसियों को निर्देश दिए कि वे SC/ST अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की प्रारंभिक जांच में सावधानी बरतें, ताकि कानून की मंशा बनी रहे और निर्दोषों को परेशान न किया जाए।
यह फैसला अभिव्यक्ति की सीमाओं, कानून की मंशा और न्यायिक संतुलन को रेखांकित करता है, साथ ही यह संदेश देता है कि कानून का संरक्षण और दुरुपयोग—दोनों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना जरूरी है।







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