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“BLO ड्यूटी और टीईटी परीक्षा का दवाब — कितनी जानें ले चुकी है SIR and TET प्रक्रिया?”

तेज इंडिया TV News 24 ,📰 रिपोर्ट:

BLO ड्यूटी और मौत — बढ़ रहा है दबाव

“BLO ड्यूटी का दवाब — कितनी जानें ले चुकी है SIR प्रक्रिया?”

नरेन्द्र नगर से, रिपोर्टर कृष्णा प्रताप त्रिपाठी।


देशभर में मतदाता सूची पुनरीक्षण यानी SIR के दौरान, बूथ-स्तरीय अधिकारियों (BLOs) पर इतना भारी काम का बोझ डाला गया है कि कई ने आत्महत्या तक कर ली। आज फिर एक ऐसा ही मामला सामने आया है। सवाल उठ रहे हैं — क्या इतनी जिम्मेदारी देने के बाद उनकी भलाई का ख्याल नहीं रखा जा रहा?
📌 मामला — मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश)
ताज़ा घटना उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले की है, जहाँ एक सहायक अध्यापक व BLO, सर्वेश सिंह ने कथित रूप से आत्महत्या कर ली। उनके द्वारा छोड़ गया सुसाइड-नोट सोशल मीडिया पर वायरल है। �


Live Hindustan +1
नोट में BLO ने लिखा है कि वह “बहुत पीड़ा महसूस कर रहा” है, “परिवार व महिलाओं की सेवा करना चाहता था”, लेकिन काम का दबाव — “टारगेट पूरा करने” की धमकी और “निरंतर दबाव” — ने उसे तोड़ दिया। (जैसा कि सोशल मीडिया पोस्ट में दिख रहा है —
📈 आंकड़े: कितने BLO, कहां — मौतें और आत्महत्या
2025 की शुरुआत से लेकर अब तक, पूरे देश में कई BLOs की मौतें हुई हैं — कुछ आत्महत्या, कुछ काम के दबाव व स्वास्थ्य समस्याओं के कारण। �
The Daily Jagran +3
रिपोर्ट्स के अनुसार: “कम-से-कम 16 BLOs” विभिन्न राज्यों में मौत के शिकार हुए हैं। �
The Daily Jagran +1
इनमें से कई की मौत को आत्महत्या माना गया: उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल की Rinku Tarafdar, केरल के Aneesh George, राजस्थान के Mukesh Jangid, गुजरात के Arvindkumar Vadhel और अब उत्तर प्रदेश के सर्वेश सिंह शामिल हैं। �


The Indian Express +5
परिवारों ने एक ही बात दोहराई है — “गर्व से काम करना चाहते थे, लेकिन निरंतर दबाव, लक्ष्य और ज़्यादा ड्यूटी ने उन्हें निराश कर दिया।” �
India Today +5
⚠️ क्या है समस्या — BLOs की मेहनत, सिस्टम की कमज़ोरी
BLOs — जिन्हें अक्सर स्कूल शिक्षक या सहायक अध्यापक बनाया गया है — अपनी मूल ड्यूटी के साथ-साथ SIR के लिए हफ़्तों-दिन रात-दिन एक साथ काम कर रहे हैं। �
India Today +2
उन्हें मतदाता फॉर्म बांटने, एकत्र करने, एप पर अपलोड करने और सूची सही करने का काम सौंपा गया है — लेकिन समय, ट्रेनिंग और संसाधन पर्याप्त नहीं।

कई प्रकरणों में, परिवारों ने कहा कि अधिकारीयों द्वारा “टारगेट पूरा करो या सस्पेंड हो जाओ” जैसे दबाव दिए जा रहे थे। �


The Indian Express +4
अनेक BLOs ने कहा कि वे नींद, भोजन, विश्राम तक भूल गए थे — ऐसा बोझ असहनीय हो गया। �
ThePrint Hindi +2
🧾 तस्वीर के सुसाइड-नोट जैसा मामला और भी हैं — जिसमें BLO ने खुद के जीवन, परिवार और जिम्मेदारियों का उल्लेख करते हुए “अब और नहीं कर सकता” जैसा भाव लिखा है, बिल्कुल वही है जो हाल के मामले बयान करते हैं।
जैसे मुरादाबाद में — सुसाइड-नोट में लिखा गया था कि “टारगेट पूरा नहीं हुआ, दबाव समझ नहीं आया, मैं ये नहीं कर सकता।” �


Dynamite News Hindi +1
इसी तरह पश्चिम बंगाल की Rinku Tarafdar ने नोट में कहा था कि “अगर BLO का काम पूरा नहीं हुआ, तो प्रशासनिक कार्रवाई होगी” — वह ऐसा बोझ झेल नहीं सकीं। �
The Indian Express +1

🔎 क्या सरकार / न्यायालय हस्तक्षेप कर रहे हैं?
अब तक, मृत BLOs के परिवारों या राज्य सरकारों ने कई दावे और शिकायतें दर्ज कराई हैं — कि यह “काम का अधिक बोझ + गलत समय-सीमा + दबाव” थे। कई BLO यूनियन, शिक्षक संगठन और विपक्ष ने इस बात पर चिंता जताई है। �


Moneycontrol +2
हालांकि, आयोग या सरकार ने अभी तक स्पष्ट जवाब नहीं दिया है कि वे काम के बोझ को कम करेंगे, टाइम-लाइन बदलेंगे या मानसिक स्वास्थ्य / काउंसलिंग की व्यवस्था करेंगे। �
www.ndtv.com +2
इस बीच, BLOs ने देश के कई हिस्सों में SIR ड्यूटी से विरोध शुरू कर दिया है। कुछ ने ड्यूटी से ही इनकार कर दिया। �
India Today +2
🎙️ रिपोर्टर नोट (Tez India के लिए)
यह सिर्फ एक नोट-पत्र नहीं है — यह गुस्सा, हताशा और उस पूरी प्रणाली की विफलता है, जो बोझ तो बढ़ा देती है लेकिन समर्पण और संवेदनशीलता नहीं दिखाती। BLOs — जो स्कूलों में बच्चों को पढ़ाते रहे — अब वोटरों और चुनावों की मशीनरी का एक छोटा हिस्सा बन गए हैं। उन्हें न सिर्फ चुनावी जिम्मेदारी दे दी गई, बल्कि ऐसा बोझ, ऐसा दबाव, कि कहीं इंसान के अधिकार गायब हो गए।


ये सूचनाएँ, प्रत्यक्ष प्रसंग और आत्महत्या के डरावने आंकड़े यह दिखाते हैं कि सिर्फ “मतदाता सूची संशोधन” नहीं हुआ — बल्कि, लोगों की ज़िंदगियाँ छीन ली गईं।
बतौर रिपोर्टर के तौर पर मैं यह कहना चाहूँगा — सरकार, चुनाव आयोग और न्यायालय को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। BLOs की ड्यूटी, कार्य-शर्तें, मानसिक स्वास्थ्य, विश्राम — सब पर पुनर्विचार होना चाहिए, अन्यथा और जानें जाएँगी।

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